अगर दूसरी बारी में भी लड़की हुई तो क्या करोगी?

निकिता के जब पहली बेटी हुई तो उसका पति और ससुराल वाले बहुत खुश हुए। सबने माँ-बच्चे का खूब ध्यान भी रखा। आज निकिता की बेटी ४ साल की हो गयी है और निकिता अब दोबारा प्रेग्नेंट है। 

उसकी सास ने सीधे सीधे कह दिया की हमे बस अपनी बहु और बच्चा स्वस्थ चाहिए। चाहें लड़का हो या लड़की। 

पर आस पास वालों को तो कुछ न कुछ बात चाहिए होती है। तो बस मोहल्ले की औरतें जब उससे कुछ ऊट-पटांग सवाल पूछती तो शुरू में निकिता बौखला जाती पर बाद में उसने बड़े ही मज़ेदार जवाब निकाल लिए।

आईये आपको बताते हैं वो ऊट-पटांग सवाल और निकिता के मज़ेदार जवाब – 

बेटे के लिए चांस लिया है?

नहीं आंटी जी। चांस तो मैंने डायनासोर के लिए लिया था। पर डॉक्टर्स ने बोला कि इंसान का बच्चा इंसान ही हो सकता है। वैसे आपको कुछ आईडिया है क्या ऐसे किसी प्रोग्राम के बारे में?

अगर इस बार भी बेटा नहीं हुआ तो?

आंटी जी बच्चा वापिस किया जा सकता हैं क्या? आपने कभी किया है?

बेटा हो जाता तो परिवार पूरा हो जाता? 

आंटी जी कम्पलीट फॅमिली से सरकार का मतलब तो सिर्फ “हम दो हमारे दो से ही था”। आप लोगों ने इसे बच्चे के लिंग से खुद ही जोड़ लिया। मेरा परिवार तो अभी भी पूरा ही है, दूसरे बच्चे के बाद और भरा पूरा हो जायेगा। 

लड़का नहीं हुआ तो दुःख तो होगा ही तुम्हे?

आंटी जी मैंने तो ऐसा कुछ सोचा नहीं। पर लगता है जब कम्मो दीदी हुई होंगी तो आपको बड़ा दुःख हुआ होगा।

ऐसी बातें मेरे माँ बनने की ख़ुशी (वो भी दो हेल्थी बेटियों की) को कम नहीं कर पाएंगी। अगर बेटा हुआ तो वो मेरे लिए बहुत ही ख़ास होगा। पर मेरी बेटियां भी मेरे लिए काम ख़ास नहीं हैं।

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इस कवयित्री ने अपनी कविता के माध्यम से बताया “माँ को भी गलतियां करने का हक़ है” #maatumbhigalathosaktiho

नौकरी करनी चाही तो बच्चो ने रोक दिया
कुछ घर पर ही करना चाहा तो सबने टोक दिया
तुम माँ हो, तुम अपना वक़्त बच्चो से भला कैसे छीन सकती हो
तुम माँ हो, तुम अपने लिए कैसे जी सकती हो

उपरोक्त पंक्तियाँ सिर्फ पंक्तियाँ नहीं बल्कि वो अनुभव है जिससे होकर भारत में हर बच्चा व हर माँ गुज़री है।
शायद यही वजह है कि मदर्स डे पर कवयित्री अनामिका जोशी द्वारा बोली गयी कविता “#maatumbhigalathosaktiho को लोगों ने जी भर के सराहा व शेयर किया है।

माँ तुम दोस्तों के सामने नाक मत कटवाना,
सुनो माँ, तुम स्कूल में कुछ प्रॉपर पहन के आना।

माँ से अपेक्षाएं करते करते हम कब उनकी उपेक्षा कर चुके होते हैं ये अक्सर हमे भी याद नहीं रहता।

बचपन से हम बच्चों ने माँ पर कुछ ऐसा प्यार जताया
कि माँ को हमेशा सही करने के लिए मजबूर ही पाया

माँ को हमने भगवन का दर्ज़ा दिया है और ऐसा करके उससे गलत होने का हक़ भी छीन लिया है।
भगवान बनाकर उनसे इंसान होने का हक़ न छीनें,
सुपर वुमन बोलकर उन्हें हर काम न सौंपे,
उन्हें गलतियां करने का हक़ दें, उन्हें उनके हिसाब से जीने दें
चलिए माँ को माँ ही रहने दें।

वीडियो यहाँ देखें

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घर पर रहने वाली माँ (स्टे-ऐट-होम-मदर) को कम आंकने से पहले सोचें

हमारे समाज में यह एक आम बात है कि घर में रहने वाली माँ का काम दिखाई नहीं देता क्यूंकि उसके किये काम के लिए न ही तो ऑफिस की तरह फाइल मेन्टेन की जाती है, ना कोई रिपोर्ट, ना कोई मीटिंग होती है, ना ही प्रेज़न्टेशन जिसमे वह बता सके कि पूरा दिन उसने क्या क्या काम किये थे। प्यार, ममता, गले लगाना, पोयम पढ़ कर सुनाना, डाइट का ध्यान रखना, इन सब काम का कहीं हिसाब नहीं रखा जाता। बल्कि यह सब छुप जाता है कुछ बिखरे हुए कमरे से और चंद गंदे बर्तनों से।

अभी कुछ ही दिन पहले सोसाइटी में मेरी एक नयी फ्रेंड बनी, प्रीती। उसकी छह माह की एक बेटी है। घर पर वह, उसके हस्बैंड और बेटी ही रहते हैं। पहले वह जॉब किया करती थी पर बेटी के होने के बाद उसने कुछ समय के लिए ऑफिस से ब्रेक लेने का फैसला किया। उसे लगा कि उसकी बेटी को उसकी ज़्यादा ज़रूरत है।
कल प्रीती ने मुझे बताया कि वह सोसिएटी पार्क में बेटी को लेकर गयी थी जहाँ उसे एक महिला मिलीं। वह अपनी बेटी और नाती के साथ थीं। बातों ही बातों में वह महिला प्रीती से बोलीं कि तुम्हारा तो ठीक है पर इसको काम पर वापिस जाना है। इसके लिए सब कुछ मैनेज करना बहुत मुश्किल होगा। उन्होंने तो जाने-अनजाने कह दिया पर प्रीती के दिमाग में यह बात घर कर गयी और वह मन ही मन दुखी हो गयी कि क्या अब उसका कोई अस्तित्व नहीं रहा?

क्या एक माँ की तुलना दूसरी माँ से करना सही?

यह ज़रूरी नहीं कि जो माँ नौकरी करती है वह नौकरी करना चाहती ही है।कईं बार वह नौकरी सिर्फ पेचेक (Paycheck) के लिए करती है जबकि वह सारा समय सिर्फ अपने बच्चे को देना चाहती है। ऐसे ही कईं बार एक माँ घर पर इसलिए रहती है क्यूंकि उसके बच्चे की देख-रेख करने के लिए उसके पास सपोर्ट नहीं है।

किसी भी माँ को कम आंकना, दूसरी माँ से उसकी तुलना करना बेकार है। हर माँ को अपने जीवन लक्ष्य व परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय लेना होता है।

एक माँ को सतही मानकों पर न आंके

आज पूरा सिंक बर्तन से भरा है, काम वाली नहीं आयी तो तुम बर्तन भी साफ़ नहीं कर सकती थीं? कपड़ों कि तह भी नहीं की। ऐसा क्या कर रही थीं तुम पूरा दिन?
समझें कि सिंक बर्तन से भरा है क्यूंकि खाना बना है, कपड़ों की तह नहीं बनी पर कपडे धोये हैँ।

पूरा दिन क्या करती हो? अगली बार आप किसी माँ से यह न पूछें।

यू.के. में हुए एक सर्वे के अनुसार माँ का काम लगभग ढाई फुल-टाइम जॉबस के बराबर है। भारत में हम माँ को महान तो मानते हैं पर सिर्फ इसलिए की उसने एक बच्चे को जन्म दिया है। लेकिन जन्म देने से ज़्यादा कठिन होता है एक बच्चे की परवरिश करना। फिर चाहें वह घर पर रहकर अपने परिवार के लिए त्याग करे या फिर बाहर जाकर काम करके भी अपने घर परिवार का ध्यान रखे।

स्टे-ऐट-होम-मदर अपने बच्चों के साथ ज़्यादा समय बिताती हैं और देखा गया है कि उनके बच्चे पढ़ाई में आगे होते हैं। वह बच्चों को प्रेरणा देती है कि अपने घर वालों के लिए किया हुआ कोई भी त्याग छोटा नहीं है। उन बच्चों में सहनशीलता होती है व खुश मिजाज़ होते हैं। मैं एक वर्किंग मदर हूँ और मैं यह जानती हूँ कि घर मैं रहने वाली माँ का काम आसान नहीं होता है। हमारे समाज के बैलेंस के लिए घर में रहने वाली माँ उतनी ही ज़रूरी है जितनी कि जॉब करने वाली माँ।

अगली बार जब आप अपनी माँ या पत्नी को इंट्रोडूस कराएं तो ये न कहें कि ये वर्किंग नहीं है, घर पर रहती हैँ। क्यूंकि अगर वे काम नहीं करती तो घर व्यवस्थित क्या जादू से हो जाता है?

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